Tuesday, May 29, 2012


yogendratihawali@yahoo.com
स्वयंसेवी संस्थाएं
 और जागरूक जनता इस बात से चिंतित है कि हमारे गाँव, 63 वर्ष स्वतंत्रता के पश्चात् भी, गरीब और असहाय क्यों हैं? माना कि खेती की उपज की वस्तुओं की कीमतों में काफी उछाल आया है परंतु इस उछाल का लाभ बीच-विचोले व्यापारियों और फुटकर विक्रेताओं ने अधिक उठाया। किसानों को जो हल्का सा लाभ हुआ है इसके बदले में खेत में पड़ने वाली वस्तुओं के मूल्य बढ़े हैं। की भूमि को 10-15 वर्ष के प्रयोग कर रहे हैं, उसकी कीमतों में बेशुमार उछाल आया है। बीज, कीटनाशक और डीजल इत्यादि की कीमतों में भी वृध्दि हुई है। यह समस्या उन किसानों की है जिनके पास 2-4 एकड़ या इससे अधिक भूमि है। हम बात करें उन किसानों की जिनके पास आधी या एक एकड़ भूमि है और इनकी संख्या संपन्न किसानों से बहुत अधिक है। इनके पास इतनी कम भूमि होने के कारण केवल हल्की-फुल्की खेती, रहने के लिए थोड़ा सा स्थान या एक आध गाय या बकरी रखने का हीं प्रबंध हो सकता है। खेतीहरों में इनकी संख्या 70-80 प्रतिशत हैं। किसान की थोड़ी खेती और बड़ा परिवार होने के कारण इस समय यह गरीबी रेखा से बहुत नीचे है। इनमें से तो बहुत सारे लोग शहरों को पलायन कर चुके हैं और छोटे-छोटे काम विशेषकर मजदूरी करके अपने परिवार को भूखमरी से बचाये हुए हैं।रासायनिक खाद जो किसानों 
ऐसी परिस्थियों में सरकार और स्वयंसेवी संस्थायें इन किसानों के लिए क्या कर सकती हैं? महंगाई होते हुए आज भी गाँव के अनाज और शाक-सब्जियों की कीमत कम है। इसलिए गाँव में अगर गरीब आदमी को कुद आमदनी हो जाए उसकी कोशिश यह रहती है कि वह घर को छोड़कर काम करने के लिए शहर न जाए जहां उसे झुग्गी-झोपड़ी में अकसर किसी नाले के किनारे रहना पड़ता है। परंतु उसकी कम-से-कम अवश्यकताओं की पूर्ति तो होनी ही चाहिए। यह सब संभव है। खेतीहार कहलाते हुए भी अधिक किसानों के पास परिवारों में बंटती भूमि एकड़ों में नहीं बल्कि मीटरों में रह गयी है। गाँव में इतना स्थान, तो मिलता है कि किसान 15-20 गाय पाल सकता है। एक यथार्थ अनुमान के अनुसार अगर किसान की गाया का दूध, गोबर, और गोमूत्र ठीक दामों में बिके तो किसान संपन्न हो सकता है। यह आम जनता और देश की अर्थव्यवस्था के हित में है। जहां तक दूध की बात है जनता इतनी जागरूक हो गई है कि गाय के दूध के स्वास्थ्यवर्धक गुणों को भली भांति जानती है। इसलिए उन गांवों में जहाँ छोटे-बड़े शहर केवल 100-200 किलोमीटर दूर है वहाँ विशेषकर किसान को दूध के अच्छे दाम मिल जाते हैं। कुछ गो प्रेमियों ने गाय का दूध हरियाणा और राजस्थान से दिल्ली लाने का प्रबंध किया है। गोपाल को इसके रूपया 20 प्रति लीटर देकर भी यह शुद्ध दूध दिल्ली में रुपये 30 प्रति लीटर बिक रहा है। ऐसे ही अगर कुछ कर्मठ उद्योगपति पंचगव्य संबंधित उद्योग लगाएं तो गाँव में इतनी खुशहाली आ सकती है 




जो किसी भी अनुमान से अधिक होगी। केवल दस दुधारी गायों वाला किसान भी गाय को अच्छा खिला-पिला कर, घर में खूब दूध-दही का उपभोग कर, हम गाया के पीछे राज का रुपये 50 कमा सकता है। अर्थात् दस गाय पालने वाला किसान केवल दूध की ब्रिकी कर रुपये 15000 हर मास कमा सकता है। अगर दूध की बिक्र ी के साथ-साथ गाय के गोबर और गोमूत्र के भी अच्छे दाम मिले जो एक दम संभव है, अगर इस संबंधी भी उद्योग लगें और इनकी मांग बढ़े। इसका तात्पर्य यह हुआ कि दस गाय रखने वाले किसान की रोज आमदनी रुपये 500 हो सकती है। गांव के रहन-सहन के अनुसार यह आय अच्छी मानी जाती है।भारतवासी गाय को गोमाता कहते हैं परंतु बहुत बड़ी संख्या में किसानों ने गाय पालना बंद कर दिया है। इसलिए तो गाय की ऐसी दुर्दशा हो रही है। हमारी देशी गाय की महिमा को इजराईल देश ने बहुत पहले जाना। 
















तभी तो हजारों की संख्या में उन्होंने गीर गाय को भारत से अपने देश में आयात किया। आज इजराइल में उन गायों की संख्या बहुत हो गई है। यह सब होते हुए भी इजराइल में उन गायों की संख्या बहुत हो गई है। अब सब होते हुए भी इजराइल की सरकार और जनता इससे संतुष्ट नहीं। अभी कुछ सप्ताह पूर्व ही इजराइल के राजदूत मार्क सोफर ने भारत में घोषणा की थी कि उनका देश भारत में डेरी फार्मिंग ओर एनिमल हसबेंडरी का उपयोग करना चाहता है। एक अनुमान के अनुसार यह कहा जा रहा है कि इजराइल के उद्योगपत्तियों को इस बात का अनुमान है कि भारत में डेयरी उद्योग का धंधा लाभ का होगा क्याेंकि भारत की अच्छी नसलों की गायें जैसे गीर, सहिवाल इत्यादि गुणवत्ता और मात्रा में अच्छी दूध देती हैं और भारत के आस-पास के देशों में दूध से बनी वस्तुओं की बहुत अधिक मांग है। इन देशों को यह भली-भांति पता चल गया है कि देशी गाय के उत्पादकों में अधिक पौष्टिकता और असाध्य रोगों तक को ठीक करने की क्षमता है।आशा है इजराइल के भारत में डेयरी फार्मिंग और एनिमल हसबेंडरी के उद्योग लगाने से भारत के उद्योगपत्तियों में भी चेतना आएगी कि इजराइल जैसा देश जो औद्योगिक कला में निपुण है, डेयरी फार्मिंग के उद्योग में लाभ लेगा तो यह भी बढ़-चढ़कर उद्योग लगायें। हमारे किसान जिनके पास भूमि थोड़ी है उनके लिए ऐसे उद्योग लगाने से लाभ-ही-लाभ होगा, किसानों में समृध्दि आयेगी और गांव की जो सरकार द्वारा अपेक्षित हैं फिर से संपन्न होंगे। गाय के दूध से डेरी उद्योग और गोमूत्र और गोबर से दवाइयां, टाइलज, कागज, फिनाईल इत्यादि के उद्योग लगें। किसान और अन्य गांव के लोग गाय पालें और गौ उत्पादित वस्तुओं की मांग बढ़े तो हमारे किसान संपन्न हों और गांव तथा देश खुशहाल।आशा है इजराइल के भारत में डेयरी फार्मिंग और एनिमल हसबेंडरी के उद्योग लगाने से भारत के उद्योगपत्तियों में भी चेतना आएगी कि इजराइल जैसा देश जो औद्योगिक कला में निपुण है, डेयरी फार्मिंग के उद्योग में लाभ लेगा तो यह भी बढ़-चढ़कर उद्योग लगायें। हमारे किसान जिनके पास भूमि थोड़ी है उनके लिए ऐसे उद्योग लगाने से लाभ-ही-लाभ होगा, किसानों में समृध्दि आयेगी और गांव की जो सरकार द्वारा अपेक्षित हैं फिर से संपन्न होंगे। गाय के दूध से डेरी उद्योग और गोमूत्र और गोबर से दवाइयां, टाइलज, कागज, फिनाईल इत्यादि के उद्योग लगें। किसान और अन्य गांव के लोग गाय पालें और गौ उत्पादित वस्तुओं की मांग बढ़े तो हमारे किसान संपन्न हों और गांव तथा देश खुशहाल।










प्रेषक --योगेन्द्र सिंह  तिहावली 

फतेहपुर  शेखावाटी 
सीकर   राजस्थान ,




YOGENDRA SINGH TIHAWALI 
FATHEPUR SHEKHAWAT SIKAR 
RAJASTHAN








No comments:

Post a Comment